आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से
करना सुलूक ख़ूब है अहल-ए-नियाज़ से
फिरते हो क्या दरख़्तों के साए में दूर दूर
कर लो मुवाफ़क़त किसू बेबर्ग-ओ-साज़ से
हिज्राँ में उस के करना भला न था
कोताही जो न होवे ये उम्र-ए-दराज़ से
मानिंद-ए-सुब्हा उक़दे न के कभू खुले
जी अपना क्यूँ कि उचटे न रोज़े नमाज़ से
करता है छेद छेद हमारा जिगर तमाम
वो देखना तिरा मिज़ा-ए-नीम-बाज़ से
दिल पर हो इख़्तियार तो हरगिज़ न करिए इश्क़
परहेज़ करिए इस मरज़-ए-जाँ-गुदाज़ से
आगे बिछा के नता को लाते थे तेग़ ओ तश्त
करते थे यानी ख़ून तो इक इम्तियाज़ से
माने हों क्यूँ कि गिर्या-ए-ख़ूनीं के इश्क़ में
है रब्त-ए-ख़ास चश्म को इफ़शा-ए-राज़ से
शायद शराब-ख़ाने में शब को रहे थे 'मीर'
खेले था एक मुग़बचा मोहर-ए-नमाज़ से
Responses
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है