आह जिस वक़्त सर उठाती है
अर्श पर बर्छियाँ चलाती है
नाज़-बरदार-ए-लब है जाँ जब से
तेरे ख़त की ख़बर को पाती है
ऐ -ए-हिज्र रास्त कह तुझ को
बात कुछ सुब्ह की भी आती है
चश्म-ए-बद्दूर-चश्म-ए- ऐ 'मीर'
आँखें तूफ़ान को दिखाती है
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है