आए हैं 'मीर' काफ़िर हो कर के घर में
पेशानी पर है क़श्क़ा ज़ुन्नार है कमर में
नाज़ुक बदन है कितना वो शोख़-चश्म दिलबर
जान उस के तन के आगे आती नहीं में
सीने में तीर उस के टूटे हैं बे-निहायत
सुराख़ पड़ गए हैं सारे मिरे जिगर में
आइंदा शाम को हम रोया कुढ़ा करेंगे
मुतलक़ असर न देखा नालीदन-ए-सहर में
बे-सुध पड़ा रहूँ हूँ उस मस्त-ए-नाज़ बिन मैं
आता है होश मुझ को अब तो पहर पहर में
सीरत से गुफ़्तुगू है क्या मो'तबर है सूरत
है एक सूखी लकड़ी जो बू न हो अगर में
हम-साया-ए-मुग़ाँ में मुद्दत से हूँ चुनाँचे
इक शीरा-ख़ाने की है दीवार मेरे घर में
अब सुब्ह ओ शाम शायद गिर्ये पे रंग आवे
रहता है कुछ झमकता ख़ूनाब चश्म-ए-तर में
आलम में आब-ओ-गिल के क्यूँकर निबाह होगा
अस्बाब गिर पड़ा है सारा मिरा सफ़र में
Responses
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है