क्या है इक कहानी है
ये कहानी नहीं सुनानी है
है भी अजीब या'नी जो
न ज़मीनी न आसमानी है
है मिरे शौक़-ए-वस्ल को ये गिला
उस का पहलू सरा-ए-फ़ानी है
अपनी तामीर-ए-जान-ओ-दिल के लिए
अपनी बुनियाद हम को ढानी है
ये है लम्हों का एक शहर-ए-अज़ल
याँ की हर बात ना-गहानी है
चलिए ऐ जान-ए-शाम आज तुम्हें
शम्अ इक क़ब्र पर जलानी है
रंग की अपनी बात है वर्ना
आख़िरश ख़ून भी तो पानी है
इक अबस का वजूद है जिस से
ज़िंदगी को मुराद पानी है
शाम है और सहन में दिल के
इक अजब हुज़न-ए-आसमानी है
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
बस इक ग़ुबार तौर गुमाँ का है तह ब तह
यानी नज़र भी कुछ नहीं मंज़र भी कुछ नहीं
है अब तो एक जाल सुकून हमीशगी
पर्वाज़ का तो ज़िक्र ही क्या पर भी कुछ नहीं
कितना डराؤना है ये शहर नबोद व बूद
ऐसा डराؤना कि यहाँ डर भी कुछ नहीं
पहलू में है जो मेरे कहीं और है वो शख़्स
यानी वफ़ा अहद का बिस्तर भी कुछ नहीं
निस्बत में उन की जो है अज़िय्यत वो है मगर
शह रग भी कोई शय नहीं और सर भी कुछ नहीं
याराँ तुम्हें जो मुझ से गिला है तो किस लिए
मुझ को तो अतराज़ ख़ुदा पर भी कुछ नहीं