रूह प्यासी कहाँ से आती है
ये उदासी कहाँ से आती है
है वो यक-सर सुपुर्दगी तो भला
बद-हवासी कहाँ से आती है
वो हम-आग़ोश है तो फिर में
ना-शनासी कहाँ से आती है
एक ज़िंदान-ए-बे-दिली और शाम
ये सबा सी कहाँ से आती है
तू है पहलू में फिर तिरी ख़ुश्बू
हो के बासी कहाँ से आती है
है शब-सोख़्ता सिवाए उम्मीद
तू निदा सी कहाँ से आती है
मैं हूँ तुझ में और आस हूँ तेरी
तो निरासी कहाँ से आती है
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बस इक ग़ुबार तौर गुमाँ का है तह ब तह
यानी नज़र भी कुछ नहीं मंज़र भी कुछ नहीं
है अब तो एक जाल सुकून हमीशगी
पर्वाज़ का तो ज़िक्र ही क्या पर भी कुछ नहीं
कितना डराؤना है ये शहर नबोद व बूद
ऐसा डराؤना कि यहाँ डर भी कुछ नहीं
पहलू में है जो मेरे कहीं और है वो शख़्स
यानी वफ़ा अहद का बिस्तर भी कुछ नहीं
निस्बत में उन की जो है अज़िय्यत वो है मगर
शह रग भी कोई शय नहीं और सर भी कुछ नहीं
याराँ तुम्हें जो मुझ से गिला है तो किस लिए
मुझ को तो अतराज़ ख़ुदा पर भी कुछ नहीं