ख़ूब है शौक़ का ये पहलू भी
मैं भी बरबाद हो गया तू भी
-ए-मग़मूम तमकनत में तिरी
फ़र्क़ आया न यक-सर-ए-मू भी
ये न सोचा था ज़ेर-ए-साया-ए-ज़ुल्फ़
कि बिछड़ जाएगी ये ख़ुश-बू भी
कहता था छेड़ने वाले
छेड़ना ही तो बस नहीं छू भी
हाए वो उस का मौज-ख़ेज़ बदन
मैं तो प्यासा रहा लब-ए-जू भी
याद आते हैं मो'जिज़े अपने
और उस के बदन का जादू भी
यासमीं उस की ख़ास महरम-ए-राज़
याद आया करेगी अब तू भी
याद से उस की है मिरा परहेज़
ऐ सबा अब न आइयो तू भी
हैं यही 'जौन-एलिया' जो कभी
सख़्त मग़रूर भी थे बद-ख़ू भी
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बस इक ग़ुबार तौर गुमाँ का है तह ब तह
यानी नज़र भी कुछ नहीं मंज़र भी कुछ नहीं
है अब तो एक जाल सुकून हमीशगी
पर्वाज़ का तो ज़िक्र ही क्या पर भी कुछ नहीं
कितना डराؤना है ये शहर नबोद व बूद
ऐसा डराؤना कि यहाँ डर भी कुछ नहीं
पहलू में है जो मेरे कहीं और है वो शख़्स
यानी वफ़ा अहद का बिस्तर भी कुछ नहीं
निस्बत में उन की जो है अज़िय्यत वो है मगर
शह रग भी कोई शय नहीं और सर भी कुछ नहीं
याराँ तुम्हें जो मुझ से गिला है तो किस लिए
मुझ को तो अतराज़ ख़ुदा पर भी कुछ नहीं