जुज़ गुमाँ और था ही क्या मेरा
फ़क़त इक मेरा नाम था मेरा
निकहत-ए-पैरहन से उस की
सिलसिला बे-सबा रहा मेरा
मुझ को ख़्वाहिश ही ढूँडने की न थी
मुझ में खोया रहा मेरा
थूक दे ख़ून जान ले वो अगर
आलम-ए-तर्क-ए-मुद्दआ मेरा
जब तुझे मेरी चाह थी जानाँ
बस वही वक़्त था कड़ा मेरा
कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता
इतना आसान है पता मेरा
आ चुका पेश वो मुरव्वत से
अब चलूँ काम हो चुका मेरा
आज मैं ख़ुद से हो गया मायूस
आज इक यार मर गया मेरा
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
बस इक ग़ुबार तौर गुमाँ का है तह ब तह
यानी नज़र भी कुछ नहीं मंज़र भी कुछ नहीं
है अब तो एक जाल सुकून हमीशगी
पर्वाज़ का तो ज़िक्र ही क्या पर भी कुछ नहीं
कितना डराؤना है ये शहर नबोद व बूद
ऐसा डराؤना कि यहाँ डर भी कुछ नहीं
पहलू में है जो मेरे कहीं और है वो शख़्स
यानी वफ़ा अहद का बिस्तर भी कुछ नहीं
निस्बत में उन की जो है अज़िय्यत वो है मगर
शह रग भी कोई शय नहीं और सर भी कुछ नहीं
याराँ तुम्हें जो मुझ से गिला है तो किस लिए
मुझ को तो अतराज़ ख़ुदा पर भी कुछ नहीं