हालत-ए-हाल के सबब हालत-ए-हाल ही गई
शौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की गई
तेरा फ़िराक़ जान-ए-जाँ ऐश था क्या मिरे लिए
या'नी तिरे फ़िराक़ में ख़ूब शराब पी गई
तेरे विसाल के लिए अपने कमाल के लिए
हालत-ए- कि थी ख़राब और ख़राब की गई
उस की उमीद-ए-नाज़ का हम से ये मान था कि आप
उम्र गुज़ार दीजिए उम्र गुज़ार दी गई
एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई
बा'द भी तेरे जान-ए-जाँ दिल में रहा अजब समाँ
याद रही तिरी यहाँ फिर तिरी याद भी गई
उस के बदन को दी नुमूद हम ने सुख़न में और फिर
उस के बदन के वास्ते एक क़बा भी सी गई
मीना-ब-मीना मय-ब-मय जाम-ब-जाम जम-ब-जम
नाफ़-पियाले की तिरे याद अजब सही गई
कहनी है मुझ को एक बात आप से या'नी आप से
आप के शहर-ए-वस्ल में लज़्ज़त-ए-हिज्र भी गई
सेहन-ए-ख़याल-ए-यार में की न बसर शब-ए-फ़िराक़
जब से वो चाँदना गया जब से वो चाँदनी गई
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बस इक ग़ुबार तौर गुमाँ का है तह ब तह
यानी नज़र भी कुछ नहीं मंज़र भी कुछ नहीं
है अब तो एक जाल सुकून हमीशगी
पर्वाज़ का तो ज़िक्र ही क्या पर भी कुछ नहीं
कितना डराؤना है ये शहर नबोद व बूद
ऐसा डराؤना कि यहाँ डर भी कुछ नहीं
पहलू में है जो मेरे कहीं और है वो शख़्स
यानी वफ़ा अहद का बिस्तर भी कुछ नहीं
निस्बत में उन की जो है अज़िय्यत वो है मगर
शह रग भी कोई शय नहीं और सर भी कुछ नहीं
याराँ तुम्हें जो मुझ से गिला है तो किस लिए
मुझ को तो अतराज़ ख़ुदा पर भी कुछ नहीं