घर से हम घर तलक गए होंगे
अपने ही आप तक गए होंगे
हम जो अब आदमी हैं पहले कभी
जाम होंगे छलक गए होंगे
वो भी अब हम से थक गया होगा
हम भी अब उस से थक गए होंगे
जो हम से हुआ मुआ'फ़ करो
नहीं पी थी बहक गए होंगे
कितने ही लोग हिर्स-ए-शोहरत में
दार पर ख़ुद लटक गए होंगे
शुक्र है इस -ए-कम का मियाँ
पहले ही हम खटक गए होंगे
हम तो अपनी तलाश में अक्सर
अज़ समा-ता-समक गए होंगे
उस का लश्कर जहाँ-तहाँ या'नी
हम भी बस बे-कुमक गए होंगे
'जौन' अल्लाह और ये आलम
बीच में हम अटक गए होंगे
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बस इक ग़ुबार तौर गुमाँ का है तह ब तह
यानी नज़र भी कुछ नहीं मंज़र भी कुछ नहीं
है अब तो एक जाल सुकून हमीशगी
पर्वाज़ का तो ज़िक्र ही क्या पर भी कुछ नहीं
कितना डराؤना है ये शहर नबोद व बूद
ऐसा डराؤना कि यहाँ डर भी कुछ नहीं
पहलू में है जो मेरे कहीं और है वो शख़्स
यानी वफ़ा अहद का बिस्तर भी कुछ नहीं
निस्बत में उन की जो है अज़िय्यत वो है मगर
शह रग भी कोई शय नहीं और सर भी कुछ नहीं
याराँ तुम्हें जो मुझ से गिला है तो किस लिए
मुझ को तो अतराज़ ख़ुदा पर भी कुछ नहीं