अभी फ़रमान आया है वहाँ से
कि हट जाऊँ मैं अपने दरमियाँ से
यहाँ जो है तनफ़्फ़ुस ही में है
परिंदे उड़ रहे हैं शाख़-ए-जाँ से
दरीचा बाज़ है यादों का और मैं
हवा सुनता हूँ पेड़ों की ज़बाँ से
ज़माना था वो की ज़िंदगी का
तिरी फ़ुर्क़त के दिन लाऊँ कहाँ से
था अब तक मा'रका बाहर का दरपेश
अभी तो घर भी जाना है यहाँ से
फुलाँ से थी ग़ज़ल बेहतर फुलाँ की
फुलाँ के ज़ख़्म अच्छे थे फुलाँ से
ख़बर क्या दूँ मैं शहर-ए-रफ़्तगाँ की
कोई लौटे भी शहर-ए-रफ़्तगाँ से
यही अंजाम क्या तुझ को हवस था
कोई पूछे तो मीर-ए-दास्ताँ से
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बस इक ग़ुबार तौर गुमाँ का है तह ब तह
यानी नज़र भी कुछ नहीं मंज़र भी कुछ नहीं
है अब तो एक जाल सुकून हमीशगी
पर्वाज़ का तो ज़िक्र ही क्या पर भी कुछ नहीं
कितना डराؤना है ये शहर नबोद व बूद
ऐसा डराؤना कि यहाँ डर भी कुछ नहीं
पहलू में है जो मेरे कहीं और है वो शख़्स
यानी वफ़ा अहद का बिस्तर भी कुछ नहीं
निस्बत में उन की जो है अज़िय्यत वो है मगर
शह रग भी कोई शय नहीं और सर भी कुछ नहीं
याराँ तुम्हें जो मुझ से गिला है तो किस लिए
मुझ को तो अतराज़ ख़ुदा पर भी कुछ नहीं