अब किसी से मिरा हिसाब नहीं
मेरी आँखों में कोई ख़्वाब नहीं
ख़ून के घूँट पी रहा हूँ मैं
ये मिरा ख़ून है शराब नहीं
मैं शराबी हूँ मेरी आस न छीन
तू मिरी आस है सराब नहीं
नोच फेंके लबों से मैं ने सवाल
-ए-शोख़ी-ए-जवाब नहीं
अब तो पंजाब भी नहीं पंजाब
और ख़ुद जैसा अब दो-आब नहीं
अबद का नहीं है आन का है
और इस का कोई हिसाब नहीं
बूदश इक रू है एक रू या'नी
इस की फ़ितरत में इंक़लाब नहीं
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बस इक ग़ुबार तौर गुमाँ का है तह ब तह
यानी नज़र भी कुछ नहीं मंज़र भी कुछ नहीं
है अब तो एक जाल सुकून हमीशगी
पर्वाज़ का तो ज़िक्र ही क्या पर भी कुछ नहीं
कितना डराؤना है ये शहर नबोद व बूद
ऐसा डराؤना कि यहाँ डर भी कुछ नहीं
पहलू में है जो मेरे कहीं और है वो शख़्स
यानी वफ़ा अहद का बिस्तर भी कुछ नहीं
निस्बत में उन की जो है अज़िय्यत वो है मगर
शह रग भी कोई शय नहीं और सर भी कुछ नहीं
याराँ तुम्हें जो मुझ से गिला है तो किस लिए
मुझ को तो अतराज़ ख़ुदा पर भी कुछ नहीं