तुम्हारी के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें करने लगते हैं
हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं
तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं
हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है
जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं
सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन
तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं
वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी
फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं
दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है
तो 'फ़ैज़' दिल में सितारे उतरने लगते हैं
Responses
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हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हम ने आतिशीं की है
सुब्ह गुल हो कि शाम मय ख़ाना
मद्ह उस रू नाज़नीं की है
शैख़ से बे हरास मिलते हैं
हम ने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्र दोज़ख़ बयान हूर व क़ुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानीं हरम के सहल पसंद
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है