न अब रक़ीब न नासेह न -गुसार कोई
तुम आश्ना थे तो थीं आश्नाइयाँ क्या क्या
जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी
बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या
पहुँच के दर पे तिरे कितने मो'तबर ठहरे
अगरचे रह में हुईं जग-हँसाइयाँ क्या क्या
हम ऐसे सादा-दिलों की -मंदी से
बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या
सितम पे ख़ुश कभी लुत्फ़-ओ-करम से रंजीदा
सिखाईं तुम ने हमें कज-अदाइयाँ क्या क्या
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हम ने आतिशीं की है
सुब्ह गुल हो कि शाम मय ख़ाना
मद्ह उस रू नाज़नीं की है
शैख़ से बे हरास मिलते हैं
हम ने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्र दोज़ख़ बयान हूर व क़ुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानीं हरम के सहल पसंद
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है