कभी कभी में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे से
वो आज़माइश ओ नज़र की वो क़ुर्बतें सी वो फ़ासले से
कभी कभी आरज़ू के सहरा में आ के रुकते हैं क़ाफ़िले से
वो सारी बातें लगाव की सी वो सारे उनवाँ विसाल के से
निगाह ओ दिल को क़रार कैसा नशात ओ ग़म में कमी कहाँ की
वो जब मिले हैं तो उन से हर बार की है उल्फ़त नए सिरे से
बहुत गिराँ है ये ऐश-ए-तन्हा कहीं सुबुक-तर कहीं गवारा
वो दर्द-ए-पिन्हाँ कि सारी दुनिया रफ़ीक़ थी जिस के वास्ते से
तुम्हीं कहो रिंद ओ मोहतसिब में है आज शब कौन फ़र्क़ ऐसा
ये आ के बैठे हैं मय-कदे में वो उठ के आए हैं मय-कदे से
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हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हम ने आतिशीं की है
सुब्ह गुल हो कि शाम मय ख़ाना
मद्ह उस रू नाज़नीं की है
शैख़ से बे हरास मिलते हैं
हम ने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्र दोज़ख़ बयान हूर व क़ुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानीं हरम के सहल पसंद
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है