हिम्मत-ए-इल्तिजा नहीं बाक़ी
ज़ब्त का हौसला नहीं बाक़ी
इक तिरी दीद छिन गई मुझ से
वर्ना दुनिया में क्या नहीं बाक़ी
अपनी मश्क़-ए-सितम से हाथ न खींच
मैं नहीं या वफ़ा नहीं बाक़ी
तेरी चश्म-ए-अलम-नवाज़ की ख़ैर
में कोई गिला नहीं बाक़ी
हो चुका ख़त्म अहद-ए--ओ-विसाल
ज़िंदगी में मज़ा नहीं बाक़ी
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हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हम ने आतिशीं की है
सुब्ह गुल हो कि शाम मय ख़ाना
मद्ह उस रू नाज़नीं की है
शैख़ से बे हरास मिलते हैं
हम ने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्र दोज़ख़ बयान हूर व क़ुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानीं हरम के सहल पसंद
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है