हम ने सब शेर में सँवारे थे
हम से जितने तुम्हारे थे
रंग-ओ-ख़ुशबू के -ओ-ख़ूबी के
तुम से थे जितने इस्तिआरे थे
तेरे क़ौल-ओ-क़रार से पहले
अपने कुछ और भी सहारे थे
जब वो लाल-ओ-गुहर हिसाब किए
जो तिरे ग़म ने दिल पे वारे थे
मेरे दामन में आ गिरे सारे
जितने तश्त-ए-फ़लक में तारे थे
उम्र-ए-जावेद की दुआ करते
'फ़ैज़' इतने वो कब हमारे थे
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हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हम ने आतिशीं की है
सुब्ह गुल हो कि शाम मय ख़ाना
मद्ह उस रू नाज़नीं की है
शैख़ से बे हरास मिलते हैं
हम ने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्र दोज़ख़ बयान हूर व क़ुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानीं हरम के सहल पसंद
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है