दरबार में अब सतवत-ए-शाही की अलामत
दरबाँ का असा है कि मुसन्निफ़ का क़लम है
आवारा है फिर कोह-ए-निदा पर जो बशारत
तम्हीद-ए-मसर्रत है कि तूल-ए-शब-ए- है
जिस धज्जी को गलियों में लिए फिरते हैं तिफ़्लाँ
ये मेरा गरेबाँ है कि लश्कर का अलम है
जिस से है शहर की दीवार दरख़्शाँ
ये ख़ून-ए-शहीदाँ है कि ज़र-ख़ाना-ए-जम है
हल्क़ा किए बैठे रहो इक शम्अ को यारो
कुछ रौशनी बाक़ी तो है हर-चंद कि कम है
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हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हम ने आतिशीं की है
सुब्ह गुल हो कि शाम मय ख़ाना
मद्ह उस रू नाज़नीं की है
शैख़ से बे हरास मिलते हैं
हम ने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्र दोज़ख़ बयान हूर व क़ुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानीं हरम के सहल पसंद
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है