चश्म-ए-मयगूँ ज़रा इधर कर दे
दस्त-ए-क़ुदरत को बे-असर कर दे
तेज़ है आज -ए-दिल साक़ी
तल्ख़ी-ए-मय को तेज़-तर कर दे
जोश-ए-वहशत है तिश्ना-काम अभी
चाक-ए-दामन को ता जिगर कर दे
मेरी क़िस्मत से खेलने वाले
मुझ को क़िस्मत से बे-ख़बर कर दे
लुट रही है मिरी मता-ए-नियाज़
काश वो इस तरफ़ कर दे
'फ़ैज़' तकमील-ए-आरज़ू मालूम
हो सके तो यूँही बसर कर दे
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हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हम ने आतिशीं की है
सुब्ह गुल हो कि शाम मय ख़ाना
मद्ह उस रू नाज़नीं की है
शैख़ से बे हरास मिलते हैं
हम ने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्र दोज़ख़ बयान हूर व क़ुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानीं हरम के सहल पसंद
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है