बात बस से निकल चली है
की हालत सँभल चली है
अब जुनूँ हद से बढ़ चला है
अब तबीअ'त बहल चली है
अश्क ख़ूनाब हो चले हैं
की रंगत बदल चली है
या यूँही बुझ रही हैं शमएँ
या शब-ए-हिज्र टल चली है
लाख पैग़ाम हो गए हैं
जब सबा एक पल चली है
जाओ अब सो रहो सितारो
दर्द की रात ढल चली है
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हम ने आतिशीं की है
सुब्ह गुल हो कि शाम मय ख़ाना
मद्ह उस रू नाज़नीं की है
शैख़ से बे हरास मिलते हैं
हम ने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्र दोज़ख़ बयान हूर व क़ुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानीं हरम के सहल पसंद
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है