ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो
मिरे फ़साना-ए- को मिरी ज़बाँ से सुनो
सुनाओ -ए-दिल अपना तो दम-ब-दम फ़रियाद
मिसाल-ए-नय मिरी हर एक उस्तुख़्वाँ से सुनो
करो हज़ार सितम ले के ज़िक्र क्या यक यार
शिकायत अपनी तुम इस अपने नीम-जाँ से सुनो
ख़ुदा के वास्ते ऐ हमदमो न बोलो तुम
पयाम लाया है क्या नामा-बर वहाँ से सुनो
तुम्हारे इश्क़ ने रुस्वा किया जहाँ में हमें
हमारा ज़िक्र न तुम क्यूँकि इक जहाँ से सुनो
सुनो तुम अपनी जो तेग़-ए-निगाह के औसाफ़
जो तुम को सुनना हो उस शोख़-ए-दिल-सिताँ से सुनो
'ज़फ़र' वो बोसा तो क्या देगा पर कोई दुश्नाम
जो तुम को सुनना हो उस शोख़-ए-दिल-सिताँ से सुनो
Responses
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लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में