याँ का बिस्तर है गले में कफ़नी है
वाँ हाथ में आईना है पैरहनी है
हाथों से हमें इश्क़ के दिन रात नहीं चैन
फ़रियाद ओ फ़ुग़ाँ दिन को है शब नारा-ज़नी है
हुश्यार हो ग़फ़लत से तू ग़ाफ़िल न हो ऐ दिल
अपनी तो नज़र में ये जगह बे-वतनी है
कुछ कह नहीं सकता हूँ ज़बाँ से कि ज़रा देख
क्या जाए है जिस जाए न कुछ दम-ज़दनी है
मिज़्गाँ पे मिरे लख़्त-ए-जिगर ही नहीं यारो
इस तार से वो रिश्ता अक़ीक़-ए-यमनी है
लिख और ग़ज़ल क़ाफ़िए को फेर 'ज़फ़र' तू
अब तब्अ' की दरिया की तिरी मौज-ज़नी है
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लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में