वाक़िफ़ हैं हम कि हज़रत-ए- ऐसे शख़्स हैं
और फिर हम उन के यार हैं हम ऐसे शख़्स हैं
दीवाने तेरे दश्त में रक्खेंगे जब क़दम
मजनूँ भी लेगा उन के क़दम ऐसे शख़्स हैं
जिन पे हों ऐसे ज़ुल्म ओ सितम हम नहीं वो लोग
हों रोज़ बल्कि लुत्फ़ ओ करम ऐसे शख़्स हैं
यूँ तो बहुत हैं और भी ख़ूबान-ए--फ़रेब
पर जैसे पुर-फ़न आप हैं कम ऐसे शख़्स हैं
क्या क्या जफ़ा-कशों पे हैं उन दिलबरों के ज़ुल्म
ऐसों के सहते ऐसे सितम ऐसे शख़्स हैं
दीं क्या है बल्कि दीजिए ईमान भी उन्हें
ज़ाहिद ये बुत ख़ुदा की क़सम ऐसे शख़्स हैं
आज़ुर्दा हूँ अदू के जो कहने पे ऐ 'ज़फ़र'
ने ऐसे शख़्स वो हैं न हम ऐसे शख़्स हैं
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में