वाँ रसाई नहीं तो फिर क्या है
ये जुदाई नहीं तो फिर क्या है
हो मुलाक़ात तो सफ़ाई से
और सफ़ाई नहीं तो फिर क्या है
दिलरुबा को है दिलरुबाई शर्त
दिलरुबाई नहीं तो फिर क्या है
गिला होता है आश्नाई में
आश्नाई नहीं तो फिर क्या है
अल्लाह अल्लाह रे उन बुतों का ग़ुरूर
ये ख़ुदाई नहीं तो फिर क्या है
आई तो टल नहीं सकती
और आई नहीं तो फिर क्या है
मगस-ए-क़ाब अग़निया होना है
बे-हयाई नहीं तो फिर क्या है
बोसा-ए-लब -ए-शिकस्ता को
मोम्याई नहीं तो फिर क्या है
नहीं रोने में गर 'ज़फ़र' तासीर
जग-हँसाई नहीं तो फिर क्या है
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लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में