सब रंग में उस की मिरे शान है मौजूद
ग़ाफ़िल तू ज़रा देख वो हर आन है मौजूद
हर तार का दामन के मिरे कर के तबर्रुक
सर-बस्ता हर इक ख़ार-ए-बयाबान है मौजूद
उर्यानी-ए-तन है ये ब-अज़-ख़िलअत-ए-शाही
हम को ये तिरे में सामान है मौजूद
किस तरह लगावे कोई दामाँ को तिरे हाथ
होने को तू अब दस्त-ओ-गरेबान है मौजूद
लेता ही रहा रात तिरे रुख़ की बलाएँ
तू पूछ ले ये ज़ुल्फ़-ए-परेशान है मौजूद
तुम चश्म-ए-हक़ीक़त से अगर आप को देखो
आईना-ए-हक़ में दिल-ए-इंसान है मौजूद
कहता है 'ज़फ़र' हैं ये सुख़न आगे सभों के
जो कोई यहाँ साहिब-ए-इरफ़ान है मौजूद
Responses
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लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में