मैं हूँ आसी कि पुर-ख़ता कुछ हूँ
तेरा बंदा हूँ ऐ कुछ हूँ
जुज़्व ओ कुल को नहीं समझता मैं
में थोड़ा सा जानता कुछ हूँ
तुझ से उल्फ़त निबाहता हूँ मैं
बा-वफ़ा हूँ कि बेवफ़ा कुछ हूँ
जब से ना-आश्ना हूँ मैं सब से
तब कहीं उस से आश्ना कुछ हूँ
नश्शा-ए-इश्क़ ले उड़ा है मुझे
अब मज़े में उड़ा रहा कुछ हूँ
ख़्वाब मेरा है ऐन बेदारी
मैं तो उस में भी देखता कुछ हूँ
गरचे कुछ भी नहीं हूँ मैं लेकिन
उस पे भी कुछ न पूछो क्या कुछ हूँ
समझे वो अपना ख़ाकसार मुझे
ख़ाक-ए-रह हूँ कि ख़ाक-ए-पा कुछ हूँ
चश्म-ए-अल्ताफ़ फ़ख़्र-ए-दीं से हूँ
ऐ 'ज़फ़र' कुछ से हो गया कुछ हूँ
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लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में