क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते
कुछ करते हैं ऐसा ब-ख़ुदा कुछ नहीं करते
अपने मरज़-ए- का हकीम और कोई है
हम और तबीबों की दवा कुछ नहीं करते
मालूम नहीं हम से हिजाब उन को है कैसा
औरों से तो वो शर्म ओ हया कुछ नहीं करते
गो करते हैं ज़ाहिर को सफ़ा अहल-ए-कुदूरत
पर को नहीं करते सफ़ा कुछ नहीं करते
वो दिलबरी अब तक मिरी कुछ करते हैं लेकिन
तासीर तिरे नाले दिला कुछ नहीं करते
दिल हम ने दिया था तुझे उम्मीद-ए-वफ़ा पर
तुम हम से नहीं करते वफ़ा कुछ नहीं करते
करते हैं वो इस तरह 'ज़फ़र' दिल पे जफ़ाएँ
ज़ाहिर में ये जानो कि जफ़ा कुछ नहीं करते
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में