जिगर के टुकड़े हुए जल के कबाब हुआ
ये जान को मेरे कोई अज़ाब हुआ
किया जो क़त्ल मुझे तुम ने ख़ूब काम किया
कि मैं अज़ाब से छूटा तुम्हें सवाब हुआ
कभी तो शेफ़्ता उस ने कहा कभी शैदा
ग़रज़ कि रोज़ नया इक मुझे ख़िताब हुआ
पियूँ न रश्क से ख़ूँ क्यूँकि दम-ब-दम अपना
कि साथ ग़ैर के वो आज हम-शराब हुआ
तुम्हारे लब के लब-ए-जाम ने लिए बोसे
लब अपने काटा किया मैं न कामयाब हुआ
गली गली तिरी ख़ातिर फिरा ब-चश्म-ए-पुर-आब
लगा के तुझ से दिल अपना बहुत ख़राब हुआ
तिरी गली में बहाए फिरे है सैल-ए-सरिश्क
हमारा कासा-ए-सर क्या हुआ हबाब हुआ
जवाब-ए-ख़त के न लिखने से ये हुआ मालूम
कि आज से हमें ऐ नामा-बर जवाब हुआ
मँगाई थी तिरी तस्वीर दिल की तस्कीं को
मुझे तो देखते ही और इज़्तिराब हुआ
सितम तुम्हारे बहुत और दिन हिसाब का एक
मुझे है सोच ये ही किस तरह हिसाब हुआ
'ज़फ़र' बदल के रदीफ़ और तू ग़ज़ल वो सुना
कि जिस का तुझ से हर इक शेर इंतिख़ाब हुआ
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लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में