हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए
ग़ुरूर छोड़ दो ऐ ग़ाफ़िलो के लिए
गिरा दिया है हमें किस ने चाह-ए-उल्फ़त में
हम आप डूबे किसी अपने आश्ना के लिए
जहाँ में चाहिए ऐवान ओ क़स्र शाहों को
ये एक गुम्बद-ए-गर्दूं है बस गदा के लिए
वो आईना है कि जिस को है हाजत-ए-सीमाब
इक इज़्तिराब है काफ़ी -ए-सफ़ा के लिए
तपिश से दिल का हो क्या जाने सीने में क्या हाल
जो तेरे तीर का रौज़न न हो हवा के लिए
तबीब-ए-इश्क़ की दुक्काँ में ढूँडते फिरते
ये दर्दमंद-ए-मोहब्बत तिरी दवा के लिए
जो हाथ आए 'ज़फ़र' ख़ाक-पा-ए-'फ़ख़रूद्दीन'
तो मैं रखूँ उसे आँखों के तूतिया के लिए
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लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में