है को जो याद आई फ़लक-ए-पीर किसी की
आँखों के तले फिरती है तस्वीर किसी की
गिर्या भी है नाला भी है और आह-ओ-फ़ुग़ाँ भी
पर में हुई उस के न तासीर किसी की
हाथ आए है क्या ख़ाक तिरे ख़ाक-ए-कफ़-ए-पा
जब तक कि न क़िस्मत में हो इक्सीर किसी की
यारो वो है बिगड़ा हुआ बातें न बनाओ
कुछ पेश नहीं जाने की तक़रीर किसी की
नाज़ाँ न हो मुनइ'म कि जहाँ तेरा महल है
होवेगी यहाँ पहले भी ता'मीर किसी की
मेरी गिरह-ए-दिल न खुली है न खुलेगी
जब तक न खुले ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर किसी की
आता भी अगर है तो वो फिर जाए है उल्टा
जिस वक़्त उलट जाए है तक़दीर किसी की
इस अबरू ओ मिज़्गाँ से 'ज़फ़र' तेज़ ज़ियादा
ख़ंजर न किसी का है न शमशीर किसी की
जो दिल से उधर जाए नज़र दिल हो गिरफ़्तार
मुजरिम हो कोई और हो तक़्सीर किसी की
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में