ये क्या कि सब से बयाँ की हालतें करनी
'फ़राज़' तुझ को न आईं मोहब्बतें करनी
ये क़ुर्ब क्या है कि तू सामने है और हमें
शुमार अभी से जुदाई की साअ'तें करनी
कोई हो कि पत्थर जिसे भी हम चाहें
तमाम उम्र उसी की इबादतें करनी
सब अपने अपने क़रीने से मुंतज़िर उस के
किसी को शुक्र किसी को शिकायतें करनी
हम अपने दिल से ही मजबूर और लोगों को
ज़रा सी बात पे बरपा क़यामतें करनी
मिलें जब उन से तो मुबहम सी गुफ़्तुगू करना
फिर अपने आप से सौ सौ वज़ाहतें करनी
ये लोग कैसे मगर दुश्मनी निबाहते हैं
हमें तो रास न आईं मोहब्बतें करनी
कभी 'फ़राज़' नए मौसमों में रो देना
कभी तलाश पुरानी रिफाक़तें करनी
Responses
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एक मुद्दत से मुक़द्दर है ग़रीब अलोतनी
कोई परदीस में ना ख़ुश हो तो घर भी जाए
अपनी ही आवाज़ को बे शक कान में रखना
लेकिन शहर की ख़ामोशी भी ध्यान में रखना
मेरे झूट को तोलो भी और खोलो भी तुम
लेकिन अपने सच को भी मीज़ान में रखना
कल तारीख़ यक़ीना ख़ुद को दहराये गी
आज के इक इक मंज़र को पहचान में रखना
बज़्म में यारों की शमशीर के जौहर देखो
रज़म में लेकिन तल्वारों को मीआन में रखना
उस दरिया से आगे एक समुंदर भी है
और वो बे साहिल है ये भी ध्यान में रखना