वहशतें बढ़ती गईं के आज़ार के साथ
अब तो हम बात भी करते नहीं -ख़्वार के साथ
हम ने इक उम्र बसर की है ग़म-ए-यार के साथ
'मीर' दो दिन न जिए हिज्र के आज़ार के साथ
अब तो हम घर से निकलते हैं तो रख देते हैं
ताक़ पर इज़्ज़त-ए-सादात भी दस्तार के साथ
इस क़दर ख़ौफ़ है अब शहर की गलियों में कि लोग
चाप सुनते हैं तो लग जाते हैं दीवार के साथ
एक तो ख़्वाब लिए फिरते हो गलियों गलियों
उस पे तकरार भी करते हो ख़रीदार के साथ
शहर का शहर ही नासेह हो तो क्या कीजिएगा
वर्ना हम रिंद तो भिड़ जाते हैं दो-चार के साथ
हम को उस शहर में ता'मीर का सौदा है जहाँ
लोग मे'मार को चुन देते हैं दीवार के साथ
जो शरफ़ हम को मिला कूचा-ए-जानाँ से 'फ़राज़'
सू-ए-मक़्तल भी गए हैं उसी पिंदार के साथ
Responses
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एक मुद्दत से मुक़द्दर है ग़रीब अलोतनी
कोई परदीस में ना ख़ुश हो तो घर भी जाए
अपनी ही आवाज़ को बे शक कान में रखना
लेकिन शहर की ख़ामोशी भी ध्यान में रखना
मेरे झूट को तोलो भी और खोलो भी तुम
लेकिन अपने सच को भी मीज़ान में रखना
कल तारीख़ यक़ीना ख़ुद को दहराये गी
आज के इक इक मंज़र को पहचान में रखना
बज़्म में यारों की शमशीर के जौहर देखो
रज़म में लेकिन तल्वारों को मीआन में रखना
उस दरिया से आगे एक समुंदर भी है
और वो बे साहिल है ये भी ध्यान में रखना