फिर उसी रहगुज़ार पर शायद
हम कभी मिल सकें मगर शायद
जिन के हम मुंतज़िर रहे उन को
मिल गए और हम- शायद
जान-पहचान से भी क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त ग़ौर कर शायद
अज्नबिय्यत की धुँद छट जाए
चमक उठ्ठे तिरी शायद
ज़िंदगी भर लहू रुलाएगी
याद-ए-यारान-ए-बे-ख़बर शायद
जो भी बिछड़े वो कब मिले हैं 'फ़राज़'
फिर भी तू इंतिज़ार कर शायद
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एक मुद्दत से मुक़द्दर है ग़रीब अलोतनी
कोई परदीस में ना ख़ुश हो तो घर भी जाए
अपनी ही आवाज़ को बे शक कान में रखना
लेकिन शहर की ख़ामोशी भी ध्यान में रखना
मेरे झूट को तोलो भी और खोलो भी तुम
लेकिन अपने सच को भी मीज़ान में रखना
कल तारीख़ यक़ीना ख़ुद को दहराये गी
आज के इक इक मंज़र को पहचान में रखना
बज़्म में यारों की शमशीर के जौहर देखो
रज़म में लेकिन तल्वारों को मीआन में रखना
उस दरिया से आगे एक समुंदर भी है
और वो बे साहिल है ये भी ध्यान में रखना