अजब -ए-मसाफ़त में घर से निकला था
ख़बर नहीं है कि सूरज किधर से निकला था
ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया
अभी अभी तो अज़ाब-ए- से निकला था
ये तीर दिल में मगर बे-सबब नहीं उतरा
कोई तो हर्फ़ लब-ए-चारागर से निकला था
ये अब जो आग बना शहर शहर फैला है
यही धुआँ मिरे दीवार-ओ-दर से निकला था
मैं रात टूट के रोया तो चैन से सोया
कि दिल का ज़हर मिरी चश्म-ए-तर से निकला था
ये अब जो सर हैं ख़मीदा कुलाह की ख़ातिर
ये ऐब भी तो हम अहल-ए-हुनर से निकला था
वो क़ैस अब जिसे मजनूँ पुकारते हैं 'फ़राज़'
तिरी तरह कोई दीवाना घर से निकला था
Responses
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एक मुद्दत से मुक़द्दर है ग़रीब अलोतनी
कोई परदीस में ना ख़ुश हो तो घर भी जाए
अपनी ही आवाज़ को बे शक कान में रखना
लेकिन शहर की ख़ामोशी भी ध्यान में रखना
मेरे झूट को तोलो भी और खोलो भी तुम
लेकिन अपने सच को भी मीज़ान में रखना
कल तारीख़ यक़ीना ख़ुद को दहराये गी
आज के इक इक मंज़र को पहचान में रखना
बज़्म में यारों की शमशीर के जौहर देखो
रज़म में लेकिन तल्वारों को मीआन में रखना
उस दरिया से आगे एक समुंदर भी है
और वो बे साहिल है ये भी ध्यान में रखना