ऐसे चुप हैं कि ये भी कड़ी हो जैसे
तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे
अपने ही साए से हर गाम लरज़ जाता हूँ
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे
कितने नादाँ हैं तिरे भूलने वाले कि तुझे
करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे
तेरे माथे की शिकन पहले भी देखी थी मगर
ये गिरह अब के मिरे दिल में पड़ी हो जैसे
मंज़िलें दूर भी हैं मंज़िलें नज़दीक भी हैं
अपने ही पाँव में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे
आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँ ख़ुश हैं 'फ़राज़'
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे
Responses
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एक मुद्दत से मुक़द्दर है ग़रीब अलोतनी
कोई परदीस में ना ख़ुश हो तो घर भी जाए
अपनी ही आवाज़ को बे शक कान में रखना
लेकिन शहर की ख़ामोशी भी ध्यान में रखना
मेरे झूट को तोलो भी और खोलो भी तुम
लेकिन अपने सच को भी मीज़ान में रखना
कल तारीख़ यक़ीना ख़ुद को दहराये गी
आज के इक इक मंज़र को पहचान में रखना
बज़्म में यारों की शमशीर के जौहर देखो
रज़म में लेकिन तल्वारों को मीआन में रखना
उस दरिया से आगे एक समुंदर भी है
और वो बे साहिल है ये भी ध्यान में रखना