सुन तो सही जहान में है तेरा क्या है
कहती है तुझ को ख़ल्क़-ए- ग़ाइबाना क्या है
तू ख़ुद ही सोच ऐ दिल ये इश्क़ का सफ़र है
मंज़िल कहाँ है और ये राह-ए-बेगाना क्या है
वो हुस्न जिस ने मुझ को किया है यूँ बे-ख़ुद
पूछो न मुझ से गर्दिश-ए-पैमाना क्या है
दुनिया समझ रही है जुनून मेरा फ़िज़ूल
उस को ख़बर नहीं कि ये दीवाना क्या है
आतिश तमाम उम्र यूँही मिट के जी लिए
अब क्या बताए इश्क़ का अफ़साना क्या है
सुन तो सही जहान में है तेरा फ़साना क्या
कहती है तुझ को ख़ल्क़-ए-ख़ुदा ग़ाइबाना क्या
बाहर निकल के दीदा-ए-हैराँ के चार सो
आलम है हुस्न-ए-यार के जलवे में ग़र्क़ क्या
ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तुगू करते
लिपटती है धुआँ बन के ये आह-ए-दिल-ए-ज़ार
मिरे निकलते ही घर से चराग़ बुझते हैं
बंदगी में भी वो आज़ादा-ओ-ख़ुद-बीं हैं कि हम
उलटे फिर आए दर-ए-काबा अगर वा न हुआ
ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान है
हम तो इस जीने के हाथों मर चले