तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
वो क़त्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था
गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल को मेरे सुबह-ओ-शाम किस का था
रहा न दिल में वो बे और दर्द रहा
मुक़ाम उस का था लेकिन मुक़ाम किस का था
वफ़ा करेंगे निभाएँगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं
तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया
आफ़त की शौख़ियाँ हैं तुम्हारी निगाह में
महशर के फ़ित्ने खेलते हैं जिस की राह में
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा