रौनक़-ए-बज़्म-ए-जहाँ कुछ भी नहीं तेरे बग़ैर
सुब्ह का रंग-ए-फ़िशाँ कुछ भी नहीं तेरे बग़ैर
की बस्ती उजड़ी उजड़ी शाम-ए-तन्हाई में है
राहत-ए-जान-ओ-मकाँ कुछ भी नहीं तेरे बग़ैर
मैं ने ढूँडा हर गली हर कू-ए-शहर-ए-
ये ज़मीन ये आसमाँ कुछ भी नहीं तेरे बग़ैर
इंतज़ार-ए-दीद में ये चश्म पत्थर हो गई
अब कोई राह-ए-अमाँ कुछ भी नहीं तेरे बग़ैर
सौदा लिखे ये मर्सिया अपनी जुदाई का मगर
हर्फ़-ए-तस्वीर-ए-बयाँ कुछ भी नहीं तेरे बग़ैर
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गुल फेंके हैं औरों की तरफ़ बल्कि समर भी
ऐ ख़ाना-बर-अंदाज़-ए-चमन कुछ तो इधर भी
फ़िक्र-ए-माश इश्क़-ए-बुताँ याद-ए-रफ़्तगाँ
इस ज़िंदगी में अब कोई क्या क्या किया करे
सरसरी तुम जहान से गुज़रे
वर्ना हर जा जहान-ए-दीगर था
गुलशन में बंद क़फ़स में चमन की याद आती है
वो दिन जो गुज़रे थे आज़ादी में बहुत याद आते हैं
इश्क़ ने ज़ालिम तुझे किस राह पर डाला है
न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम
निगाह-ए-नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या क्या
हिजाब-ए-हुस्न में छुपते हैं राज़ क्या क्या