दिखाई दिए यूँ के बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
जबीं सज्दा करते ही करते गई
हक़-ए-बंदगी हम अदा कर चले
परस्तिश की याँ तक के ऐ बुत तुझे
में सभों की ख़ुदा कर चले
झमेलों हैं सब -ओ-वस्ल-ओ-फ़िराक़
हमें आज सब से रिहा कर चले
गई उम्र दर-बंद-ए-फ़िक्र-ए-ग़ज़ल
सो इस फ़न को ऐसा बड़ा कर चले
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है