हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ून जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
कहाँ मयख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और