वे शेर जहाँ महबूब का इश्क़ ख़ुदा का इश्क़ बन जाता है।
दर्द का तसव्वुफ़ इस सूची का शांत हृदय है।
तोहमतें चंद अपने ज़िम्मे धर चले
जिस लिए आए थे सो हम कर चले
अर्ज़-ओ-समा कहाँ तेरी वुसअत को पा सके
मेरा ही दिल है वो कि जहाँ तू समा सके
क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाता
अब तो बिन तेरे रहा नहीं जाता
याद करना हर घड़ी उस यार का
है वज़ीफ़ा मुझ दिल-ए-बीमार का
मीर इस पीड़ा को फिर मानवीय धरातल पर ले आते हैं।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
दिखाई दिए यूँ कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले